पाबंदी हटने का अलवर को नहीं अभी लाभ, बजरी के लिए दूसरे जिलों पर रहना होगा आश्रित
अलवर. सुप्रीम कोर्ट की ओर से बजरी खनन पर लगी पाबंदी हटाने के बाद भी अलवर जिले के लोगों को निर्माण कार्य के लिए बजरी पर टोंक सहित अन्य जिलों पर आश्रित रहना होगा। हालांकि अलवर जिले में बजरी खनन की एक वैध लीज है, लेकिन उसकी अभी पर्यावरणीय स्वीकृति नहीं होने से लीज धारक फिलहाल वहां बजरी खनन कर सकेंगे। बजरी खनन लीज को दोबारा चालू करने के लिए पर्यावरणीय स्वीकृति लेना जरूरी होगा। यही कारण है कि फिलहाल लोगों को पड़ोसी जिलों से आने वाली बजरी से ही काम चलाना पड़ेगा।
अलवर जिले में बानसूर क्षेत्र के हाजीपुर, चूला व हमीरपुर सहित अन्य कुछ गांवों से होकर निकलने वाली नदी में करीब एक हजार हैक्टेयर का खनन पट्टा पूर्व में दिया गया था। खनन पट्टा की पर्यावरणीय स्वीकृति की अवधि खत्म होने व दोबारा स्वीकृति जारी नहीं हो पाई है। इसी बीच पिछले सालों में सुप्रीम कोर्ट ने प्रदेश में बजरी खनन पर रोक लगाने के आदेश दिए थे। इसके चलते बानसूर क्षेत्र में भी बजरी का खनन बंद करना पड़ा। हालांकि अब सुप्रीम कोर्ट ने बजरी खनन पर लगी रोक हटा ली है, लेकिन पर्यावरणीय स्वीकृति के अभाव में बानसूर क्षेत्र में स्वीकृत लीज से बजरी खनन फिलहाल संभव नहीं हो सकेगा।
टोंक से बजरी लानी होगी
फिलहाल टोंक जिले की बजरी लीज के पास पर्यावरणीय स्वीकृति होने से वहां बजरी खनन हो सकेगा। इसलिए अलवर जिले में भी टोंक जिले से ही बजरी लाने की मजबूरी होगी। टोंक जिले से अलवर की दूरी ज्यादा होने से यहां के लोगों का सस्ती बजरी का मिलने का सपना फिलहाल अधूरा ही रहने की संभावना है।
अवैध बजरी खनन पर भी पूूरी रोक सभव नहीं
जिले में एक भी बजरी खनन की लीज चालू नहीं होने से स्थानीय स्तर पर अवैध तरीके से निकाली जाने वाली बजरी पर पूरी तरह रोक लग पाना संभव नहीं होगा। कारण है कि निर्माण कार्यों के चलते लोगों को बजरी खरीदनी होती है, टोंक व अन्य जिलों से आने वाली बजरी महंगी होने के कारण सस्ती दर पर बजरी खरीदना चाहते हैं। जिले में बजरी के अवैध खनन करने वाले इसी मजबूरी का लाभ उठाने के लिए स्थानीय स्तर पर अवैध तरीके से बजरी खनन कर चोरी-छुपे बेचते हैं।
source https://www.patrika.com/alwar-news/alwar-letest-news-7170127/
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