अलवर से एक कविता रोज: इंसानियत जिंदा है या मर गई, लेखिका- अनुराधा तिवारी अलवर

इंसानियत जिंदा है या मर गई

एक बेज़ुबा की मौत से इंसानियत हमें अलविदा कर गई|
8 पुलिसकर्मियों की हत्या से इंसान की बेरहमी उभर गई||
बेजुबान जानवर को फांसी पर लटकाने से दरिंदगी निखर गई|

इंसानियत का पता ढूंढते ढूंढते मेरी पूरी उम्र गई|
तब जाकर एहसास हुआ कि इंसानियत तो कब की गुजर गई||
जब डॉक्टर पर थूककर उनके एहसानों का हिसाब हुआ|
तब जाकर बेशर्मी का चेहरा बेनकाब हुआ||

अब यूं ही चलता रहेगा यह दरिंदगी का सिलसिला|
इस कदर मुझे भविष्य के अंधकार का जवाब मिला||

ऐ जिंदगी! अब मुझे तुमसे नहीं है कोई शिकवा और ना ही कोई गिला|
इंसान में इंसानियत को नहीं जाना या फिर इंसानियत ने
इंसान को पहचानने में देर कर दी|
बेगुनाही की सजा पाते पाते इंसानियत ने मेरी आंखें ना उम्मीद से भर दी||

अनुराधा तिवारी
43 नेहरू नगर NEB, अलवर

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source https://www.patrika.com/alwar-news/alwar-se-ek-kavita-roj-insaniyat-zinda-hai-ya-mar-gai-6429343/

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