अलवर से एक कविता रोज: ये कार के शीशे पर बारिश की बूँदे- लेखक विपुल कुमार भावलिया अलवर

अलवर से एक कविता रोज-

ये कार के शीशे पर बारिश की बूँदे,

ये कार के शीशे पर बारिश की बूँदे,

जैसे तेरे माथे की बिन्दिया, माथे पर बोर |

जैसे तेरी गोल-गोल ये आँखे, आँखों में भरा ये प्यार,
जैसे तेरा हर्षित ये मन, चित्त तेरा ये चोर ||
तेरा कभी ये गुस्सा, तेरा ये डाँटना-फटकारना,
बारिश की बूँदों की तरह जल्द उतर जाता |
सब गिले-सिकवे, मन के मैल को धो जाता,
बस ये मुस्काता चेहरा नजर आता-2 ||
वसुधा भी समां लेती, बारिश की बूँदों को,
मेरे ये भाव, तेरी ही तरह आगोश में-2 |
इन बूँदों को देखकर, तेरा बदन इठलाता हैं,
तेरी ये पाजेब, तगड़ी बजती हैं जोश में ||
जब ये बूँदें तेरे बदन को छू लेती,
सिर से उतरकर तेरे पैरों में सर्वस्य त्याग देती |
मैं सोचता हूँ, मैं, मैं नहीं, तेरा ही अंश हूँ,
तू हर तेरी अदाओं से, ये जग को दिखा देती-

विपुल कुमार भावलिया, निवासी- अलवर शहर



source https://www.patrika.com/alwar-news/alwar-se-ek-kavita-roj-car-ke-sheeshe-par-barish-ki-boonde-vipul-kumar-6422148/

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